लेबनान संकट पर फ्रांस की अमेरिका को दो टूक सलाह क्यों मायने रखती है

लेबनान संकट पर फ्रांस की अमेरिका को दो टूक सलाह क्यों मायने रखती है

मध्य पूर्व में शांति की कोशिशें एक बार फिर दांव पर हैं। अमेरिका और ईरान के बीच वर्साय में हुए ताजा समझौते के बाद दुनिया को लगा था कि शायद अब बंदूकें शांत हो जाएंगी। पर जमीन पर ऐसा कुछ नहीं दिख रहा। इजरायल ने साफ कर दिया है कि वह दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ अपने हमले रोकने वाला नहीं है। इसी बीच फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरो ने सीधा मोर्चा संभाल लिया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि अगर लेबनान में खून-खराबा रोकना है तो अमेरिका को इजरायल पर अपनी पूरी ताकत से दबाव बनाना होगा।

यह कोई साधारण बयान नहीं है। यह दिखाता है कि पश्चिमी देशों के बीच इस युद्ध को लेकर कितनी गहरी बेचैनी है। लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि जब शांति समझौता हो चुका है तो फिर हमले क्यों हो रहे हैं। जवाब सीधा है। इजरायल इस समझौते की शर्तों को पूरी तरह मानने को तैयार नहीं दिख रहा। Learn more on a related issue: this related article.

वर्साय समझौता और इजरायल की जिद

अमेरिका और ईरान के बीच जिस शांति समझौते पर सहमति बनी थी, उसकी पहली शर्त ही यही थी कि सभी मोर्चों पर तुरंत युद्धविराम होगा। इसमें लेबनान भी शामिल था। इसके बावजूद इजराइली वायुसेना लगातार दक्षिणी लेबनान पर बम बरसा रही है। हालिया हमलों में ही १८ से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और दर्जनों घायल हैं।

फ्रांस के विदेश मंत्री बैरो ने साफ किया कि इस समझौते का कोई दूसरा विकल्प था ही नहीं। अगर यह डील न होती तो होर्मुज जलडमरूमध्य का रास्ता पूरी तरह बंद हो जाता। इसका सीधा असर दुनिया भर में तेल की कीमतों और हमारी जेबों पर पड़ता। लेकिन इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अभी भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि जब तक हिजबुल्लाह का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हो जाता, इजराइली सेना लेबनान में डटी रहेगी। Further analysis by TIME delves into similar perspectives on this issue.

अमेरिका की भूमिका पर सवाल

यहाँ सबसे बड़ा सवाल वाशिंगटन की नीयत पर उठता है। अमेरिका इस पूरे समझौते का मुख्य सूत्रधार रहा है। फिर भी वह इजरायल को रोकने में नाकाम दिख रहा है। फ्रांस यही याद दिला रहा है कि अमेरिका के पास इजरायल को नियंत्रित करने की चाबी है। अगर अमेरिका अपनी सैन्य और कूटनीतिक मदद का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए नहीं करेगा, तो यह समझौता सिर्फ कागज का टुकड़ा बनकर रह जाएगा।

इजरायल के कुछ अधिकारियों ने इस डील की आलोचना भी की थी, जिसके बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने उन्हें कड़े शब्दों में फटकार लगाई थी। इससे साफ है कि अमेरिकी प्रशासन के भीतर भी इजरायल के अड़ियल रुख को लेकर गुस्सा बढ़ रहा है।

आगे का रास्ता क्या है

अब बातें करने का समय निकल चुका है। फ्रांस अभी भी लेबनान की सेना को मजबूत करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने की कोशिश में जुटा है। लेबनान की संप्रभुता की रक्षा तभी हो सकती है जब वहां की आधिकारिक सेना मजबूत हो, न कि कोई सशस्त्र गुट।

क्षेत्र में स्थायी शांति लाने के लिए इन ठोस कदमों पर तुरंत अमल करना होगा।

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  • अमेरिका को इजरायल को दी जाने वाली सैन्य सहायता की समीक्षा करनी चाहिए ताकि वह युद्धविराम का पालन करे।
  • ईरान को अपने वादे के मुताबिक हिजबुल्लाह को हथियारों की सप्लाई पूरी तरह बंद करनी होगी।
  • संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में लेबनान की सेना को दक्षिणी सीमा पर तैनात किया जाए ताकि इजरायल को सुरक्षा की गारंटी मिल सके।

अगर इन मोर्चों पर तुरंत कड़ाई नहीं दिखाई गई, तो मध्य पूर्व में छिड़ी यह जंग पूरे वैश्विक आर्थिक ढांचे को मंदी की ओर धकेल देगी। अमेरिका को अब चुनना होगा कि वह शांति का साथ देगा या आंखें मूंदकर तबाही का तमाशा देखता रहेगा।

AM

Aiden Martinez

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